MP में नर्मदा प्रदूषण मामला गरमाया, NGT ने मांगी विस्तृत जानकारी
भोपाल। मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी मानी जाने वाली पावन नर्मदा नदी में एक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान भारी मात्रा में दूध और साड़ियां प्रवाहित करने के मामले को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बेहद गंभीरता से लिया है। ट्रिब्यूनल ने इस कृत्य से नदी के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की जांच के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) को आदेश जारी कर एक विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
सीहोर के धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ा है पूरा विवाद
यह पूरा मामला सीहोर जिले के अंतर्गत आने वाले सतदेव और भेरूंदा क्षेत्र में बीते अप्रैल माह में आयोजित हुए एक बड़े धार्मिक आयोजन से संबंधित है। इस घटनाक्रम के खिलाफ एनजीटी की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच में एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जस्टिस श्यो कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने इस पर वैधानिक सुनवाई की।
नदी के पर्यावरण और जलीय जीवों को खतरे की आशंका
अदालत में दायर याचिका के मुताबिक, नसरुल्लागंज तहसील के ग्राम सतदेव और भेरूंदा में संपन्न हुए धार्मिक कार्यक्रम के दौरान 11 हजार लीटर दूध नदी में चढ़ाया गया और साथ ही 210 साड़ियों को जल में विसर्जित कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि इतनी बड़ी तादाद में सामग्रियों को सीधे नदी में बहाना वहाँ के इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) और पर्यावरण के लिए बेहद घातक है। इससे न केवल नर्मदा का पानी दूषित हो रहा है, बल्कि जलीय जीवों के जीवन पर भी संकट मंडरा रहा है। साथ ही, आस-पास के क्षेत्रों में सिंचाई और पीने के पानी के स्रोत भी खराब होने की आशंका है।
NGT ने कहा: कानूनन नदियों में कुछ भी प्रवाहित करना प्रतिबंधित
मामले की समीक्षा करते हुए ग्रीन ट्रिब्यूनल ने टिप्पणी की कि वर्तमान में इस बात के कोई पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण या आंकड़े मौजूद नहीं हैं जो यह साबित करें कि दूध बहाने से पानी किस हद तक प्रदूषित होता है। हालांकि, कोर्ट ने सख्त लहजे में याद दिलाया कि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 24 के तहत किसी भी प्रकार की बाहरी या प्रदूषक सामग्री को जल स्रोतों में सीधे प्रवाहित करने पर पूरी तरह से पाबंदी है।
दूध से बढ़ सकती है पानी में ऑक्सीजन की कमी
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में पर्यावरण विज्ञान का हवाला देते हुए कहा कि दूध जैसे ऑर्गेनिक (कार्बनिक) तत्व जब भारी मात्रा में पानी में मिलते हैं, तो वे वहां बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) को बढ़ा देते हैं। इसका मतलब है कि पानी में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा घटने लगती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों का दम घुट सकता है। कोर्ट ने यह भी माना कि आस्था के नाम पर नदियों में दूध और अन्य सामग्रियां अर्पित करने की यह सदियों पुरानी परंपरा अब सार्वजनिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से एक बड़ी बहस का रूप ले चुकी है।
क्या नए नियम बनाने की है जरूरत? जुलाई में होगी अगली सुनवाई
एनजीटी ने सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को साफ निर्देश दिए हैं कि वे पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की एक टीम बनाकर इस विषय पर गहन रिसर्च करें। जांच में यह स्पष्ट किया जाए कि क्या वर्तमान नियमों के तहत ऐसी गतिविधियों को रोका जा सकता है, या फिर धार्मिक आयोजनों के लिए अलग से कड़े दिशा-निर्देश और नियम तैयार करने की आवश्यकता है। प्रदूषण बोर्ड को यह भी साफ करना होगा कि क्या सचमुच दूध से जल प्रदूषण फैलता है। इस मामले की अगली न्यायिक सुनवाई अब 17 जुलाई 2026 को मुकर्रर की गई है, तब तक दोनों विभागों को अपनी संयुक्त रिपोर्ट ट्रिब्यूनल के समक्ष जमा करनी होगी।


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