थायरॉइड से हैं परेशान? जानिए शरीर में कौन-सी कमी बढ़ाती है खतरा
क्या आप पिछले कुछ समय से बिना किसी ठोस वजह के वजन के अचानक बढ़ने या घटने से परेशान हैं? क्या आपको अक्सर घबराहट महसूस होती है, दिल की रफ्तार तेज हो जाती है या सामान्य से ज्यादा पसीना आता है? अगर ऐसा है, तो इन शारीरिक बदलावों को हल्के में न लें। ये तमाम लक्षण शरीर में थायरॉइड ग्रंथि की गड़बड़ी की ओर इशारा हो सकते हैं। आज के दौर में यह समस्या एक बड़े हेल्थ क्राइसिस के रूप में उभर रही है।
वैश्विक स्तर पर थायरॉइड के मरीजों की तादाद लगातार इजाफा हो रहा है। इस बीमारी में शरीर के लिए जरूरी कुछ विशेष हार्मोन्स का बैलेंस बिगड़ जाता है—या तो वे जरूरत से कम बनते हैं या बहुत ज्यादा। इसका सीधा असर हमारे पूरे शरीर की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 4 करोड़ से अधिक लोग इस विकार की चपेट में हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों की रिपोर्ट बताती है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में थायरॉइड से पीड़ित होने की संभावना कई गुना अधिक होती है। यह समस्या इंसान के बॉडी टेम्परेचर, मानसिक स्थिति (मूड), स्लीप पैटर्न और यहाँ तक कि फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर सकती है।
इसी वजह से, थायरॉइड विकारों की समय पर पहचान और इसके सही इलाज को लेकर लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 25 मई को दुनिया भर में 'विश्व थायरॉइड दिवस' (World Thyroid Day) मनाया जाता है। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि यह बीमारी आखिर क्यों होती है और इससे पीड़ित होने पर क्या कदम उठाने चाहिए।
क्या है थायरॉइड? इसके प्रकारों को समझें
थायरॉइड हमारी गर्दन के निचले हिस्से में सामने की तरफ स्थित तितली के आकार की एक छोटी सी ग्रंथि (Gland) होती है। इसका मुख्य काम ऐसे हार्मोन्स को रिलीज करना है जो हमारे मेटाबॉलिज्म और ऊर्जा को नियंत्रित रखते हैं। जब इस ग्रंथि की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तो मुख्य रूप से दो तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं:
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हाइपोथायरायडिज्म (Hypothyroidism): इसमें थायरॉइड ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन्स नहीं बना पाती। नतीजा यह होता है कि शरीर का मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ जाता है, जिससे वजन बढ़ना, हर वक्त थकान रहना, अत्यधिक बाल झड़ना और त्वचा में सूखापन जैसी दिक्कतें आती हैं।
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हाइपरथायरॉइडिज्म (Hyperthyroidism): इस स्थिति में ग्रंथि जरूरत से ज्यादा हार्मोन्स का रिसाव करने लगती है। इससे शरीर की कार्यप्रणाली तेज हो जाती है, जिससे अचानक वजन घटने लगता है, हाथों में कंपन होता है, अत्यधिक बेचैनी और दिल की धड़कन अनियंत्रित होने लगती है।
यह बीमारी क्यों होती है? मुख्य वजहें
अक्सर लोग थायरॉइड के शुरुआती लक्षणों को आम कमजोरी या थकान मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक इस पर ध्यान न देने से यह हमारे दिल, दिमाग, हड्डियों और प्रजनन अंगों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। बच्चों में इसकी वजह से शारीरिक और मानसिक विकास रुक सकता है। प्रसिद्ध मेडिकल संस्थानों की रिसर्च के मुताबिक, इसके पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार होते हैं:
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ऑटोइम्यून डिसऑर्डर: यह थायरॉइड का सबसे प्रमुख कारण है। इसमें हमारे शरीर का रक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) भ्रमित होकर अपनी ही थायरॉइड ग्रंथि को बाहरी दुश्मन मान लेता है और उस पर हमला कर देता है (जैसे हाशिमोटो या ग्रेव्स डिजीज), जिससे हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है।
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आहार में आयोडीन का असंतुलन: भोजन में आयोडीन की मात्रा बहुत कम या बहुत ज्यादा होना भी इस ग्रंथि को बीमार बना देता है।
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महिलाओं में हार्मोनल बदलाव: प्रेगनेंसी, पीरियड्स के उतार-चढ़ाव और मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के दौरान महिलाओं के शरीर में बड़े पैमाने पर हार्मोन बदलते हैं, जो इस बीमारी को ट्रिगर कर सकते हैं।
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जेनेटिक या आनुवंशिक कारण: यदि परिवार में माता-पिता या किसी करीबी रिश्तेदार को यह समस्या रही हो, तो आने वाली पीढ़ी में इसका खतरा बढ़ जाता है।
बचाव और प्रबंधन: मरीजों के लिए जरूरी टिप्स
हालांकि ऑटोइम्यून कारणों से होने वाले थायरॉइड को पूरी तरह रोकना मुमकिन नहीं है, लेकिन अपनी जीवनशैली और खान-पान में सुधार करके इसके खतरों को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। अगर आप इस बीमारी से पीड़ित हैं, तो इन बातों का विशेष ख्याल रखें:
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नियमित दवा का सेवन: डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाओं को तय समय पर बिना नागा लें। खाली पेट ली जाने वाली दवाओं का विशेष ध्यान रखें।
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पोषक तत्वों से भरपूर डाइट: अपनी थायरॉइड ग्रंथि को सुचारू रूप से चलाने के लिए भोजन में जिंक, सेलेनियम, आयरन और उचित मात्रा में आयोडीन को शामिल करें। इसके लिए डॉक्टर की सलाह से अपनी डाइट में अंडा, दही, नट्स, हरी पत्तेदार सब्जियां और मछली शामिल कर सकते हैं।
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एक्टिव लाइफस्टाइल: रोजाना एक्सरसाइज या योग जरूर करें। शारीरिक रूप से सक्रिय रहने से मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है, वजन नियंत्रण में रहता है और मानसिक तनाव कम होता है।
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समय-समय पर जांच: डॉक्टर के परामर्श पर हर कुछ महीनों में 'थायरॉइड प्रोफाइल टेस्ट' (T3, T4, TSH) करवाते रहें, ताकि दवाओं की डोज को जरूरत के अनुसार एडजस्ट किया जा सके।


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