ग्वालियर. ग्वालियर में रविवार शाम को 97 वां “अखिल भारतीय तानसेन संगीत समारोह” शुरू हुआ.  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीयमंत्री, ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर ने तानसेन संगीत समारोह का शुभारंभ किया. समारोह में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़ी घोषणा की. उन्होंने प्रदेश में महान संगीतज्ञ “बैजू बावरा संगीत समारोह” शुरू करने का ऐलान किया. वहीं,  कालिदास संगीत समारोह और तानसेन संगीत अलंकरण की राशि दो लाख रुपये से बढ़ाकर पांच लाख रुपये करने की घोषणा की.मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि संस्कृति विभाग अगले साल से “बैजू बावरा संगीत अलंकरण समारोह” आयोजित करेगा. उन्होंने संस्कृति विभाग को बैजू बावरा संगीत समारोह के लिए जगह और स्थान तय करने के निर्देश दिए. बता दें, महान संगीतज्ञ बैजू बावरा की समाधि मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के चंदेरी कस्बे में स्थापित है. उनका जन्म सन 1542 में हुआ था. बैजू बावरा भारत के प्रसिद्ध ध्रुपदगायक थे. उनको बैजनाथ प्रसाद और बैजनाथ मिश्र के नाम से भी जाना जाता है. वे ग्वालियर के राजा मानसिंह के दरबार के गायक थे और अकबर के दरबार के महान गायक तानसेन के समकालीन थे. उनके जीवन के बारे में कई किवदंतियां हैं. तानसेन से उनका संगीत द्वंद चलता था. बैजू बावरा का  सन 1613 में 71 साल की उम्र ने निधन हुआ. बैजू बावरा का निधन अशोनकगर जिले के चंदेरी में हुआ था.

तानसेन और कालिदास अलंकरण की सम्मान राशि बढ़ी
सीएम शिवराज ने मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठति कालिदास सम्मान और तानसेन संगीत अलंकरण की सम्मान राशि भी बढ़ाई. उन्होंने दोनों सम्मानों की राशि अगले साल से 5- 5 लाख रुपये करने की घोषणा की. अब तक कालिदास सम्मान और तानसेन अलंकरण से सम्मानित होने वाले कलाकारों को 2 लाख रुपएये की नकद राशि दी जाती थी. उन्होंने कहा कि 2024 में 100 वां तानसेन समारोह भव्य रूप से मनाया जाएगा. सीएम ने संस्कृतिमंत्री उषा ठाकुर को 100 वें तानसेन समारोह की तैयारियां करने के निर्देश भी दिए.

600 साल पुराने पेड़ ने दी थी तानसेन को आवाज
संगीत सम्राट तानसेन को पूरी दुनिया जानती है. महान संगीतज्ञ तानसेन की आवाज में वो दम था कि जब वे राग दीपक गाते तो दीप जल उठते, मेघ मल्हार गाते तो बादल बरसने लगते थे. ये उनकी आवाज का ही जादू था. क्या आप जानते हैं उनकी आवाज में किसकी वजह से दम था. उनकी आवाज में दम था एक इमली के पेड़ की वजह से. कहा जाता है कि बचपन में तानसेन बोल नहीं पाते थे. जब तानसेन ने इस करामाती इमली के पत्ते खाए तो वो बोलने लगे. उनकी न सिर्फ आवाज आई, बल्कि उसमे इतना दम आ गया कि बादशाह अकबर ने उन्हें अपने नवरत्नों में शामिल किया.