एक राजा ने अपने उत्तराधिकारी के चुनाव के लिए राज्य के सभी नौजवानों को एक-एक बीज दिया और कहा, 'इसे गमले में लगाकर सींचना और एक वर्ष के पश्चात मेरे पास लेकर आना। जिसका पौधा सबसे अच्छा होगा, उसे राजा घोषित किया जाएगा।' सब बीज लेकर खुशी-खुशी लौटे।  पांच-छह दिन गुजर जाने पर भी जब बीज अंकुरित नहीं हुआ, तो सबने उसी प्रकार का बीज नर्सरी से खरीदकर अपने-अपने गमले में लगा दिया और सींचने लगे। इन सबमें केवल भोलू नाम का नौजवान ही ऍसा था, जिसने दूसरा बीज खरीदने का दुस्साहस नहीं किया। कुछ दिनों के पश्चात सभी युवा अपने-अपने हरे-भरे गमले के साथ राजा के सम्मुख पेश हुए, केवल भोलू ही खाली गमले के साथ कोने में नजरें चुराए खड़ा था। राजा ने उसे पास बुलाया और घोषणा कर दी कि भोलू ही मेरा उत्तराधिकारी है।  
जब जनता ने उसके खाली गमले को प्रश्नवाचक नजरों से देखा, तो राजा ने सभी के समक्ष यह भेद खोला कि 'मैंने उबले हुए बीज सभी को दिए थे। भोलू ने उसी उबले बीज को सींचा, जबकि शेष सभी ने राजा बनने के लिए बीज बदल लिए। ये बड़े-बड़े पौधे बेईमानी की कहानी कह रहे हैं। सत्य तो यही है कि बीज तो अंकुरित होना ही नहीं था, बावजूद इसके भोलू हिम्मत व ईमानदारी से अपना खाली गमला ही मेरे पास लेकर आया। इसलिए अगला राजा भोलू ही होगा।' यदि हम बुद्धि रूपी जमीन पर ईमानदारी का बीजारोपण कर उसे सींचेंगे, तो निसंदेह उस पर विश्वास रूपी मीठे फल निकलेंगे।