बंगाल जीत के बाद और सशक्त हुआ ‘ब्रांड मोदी’, राज्यसभा में भी बढ़ी ताकत
नई दिल्ली: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में '400 पार' का लक्ष्य हासिल न कर पाने वाली भाजपा ने महज दो साल में अभूतपूर्व वापसी की है। इन नतीजों ने न केवल 'ब्रांड मोदी' को नई मजबूती दी है, बल्कि विपक्ष के उस विमर्श को भी ध्वस्त कर दिया है जिसमें भाजपा को कमजोर बताया जा रहा था। पश्चिम बंगाल जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य में ममता बनर्जी के गढ़ को ढहाकर सत्ता हासिल करना भाजपा के लिए इस सदी की सबसे बड़ी राजनीतिक जीतों में से एक मानी जा रही है।
भगवा विस्तार: 23 राज्यों में एनडीए का परचम
भाजपा की इस चुनावी आंधी ने देश के नक्शे को भगवा रंग में रंग दिया है। वर्तमान में भाजपा अपने दम पर 17 राज्यों में शासन कर रही है, जबकि एनडीए सहयोगियों के साथ गठबंधन वाली सरकारों को मिला लिया जाए तो यह आंकड़ा 23 राज्यों तक पहुंच गया है। दिल्ली में 'आप' को सत्ता से बाहर करने के बाद महाराष्ट्र, बिहार और अब असम-बंगाल की जीत ने यह साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की जन कल्याणकारी योजनाएं और 'डबल इंजन' सरकार का मंत्र धरातल पर प्रभावी है। इस जीत के साथ ही भाजपा ने पंचायत से पार्लियामेंट तक के अपने मिशन को नई गति प्रदान की है।
राज्यसभा में मजबूत पकड़ और 'आप' का साथ
संसदीय राजनीति के मोर्चे पर भी भाजपा ने बड़ी बढ़त बनाई है। राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के एनडीए खेमे में शामिल होने के बाद उच्च सदन में एनडीए की सदस्य संख्या 147 तक पहुंच गई है। यह संख्या साधारण बहुमत के आंकड़े (123) से काफी अधिक है। हालांकि, दो-तिहाई बहुमत (163) के जादुई आंकड़े के लिए अभी भी 18 सदस्यों की कमी है, लेकिन बंगाल में मिली प्रचंड जीत ने संसद में पिछले गतिरोधों और विधेयकों पर मिली हार की टीस को कम कर दिया है। अब केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को उच्च सदन में पारित कराना पहले से कहीं अधिक आसान होगा।
सनातन का मुद्दा और बिखरा हुआ विपक्ष
राजनीतिक विश्लेषक इन चुनाव परिणामों को वैचारिक जीत के रूप में भी देख रहे हैं। बंगाल में शुभेंदु अधिकारी की सफलता और तमिलनाडु में डीएमके की हार को 'सनातन धर्म' के अपमान से जोड़कर देखा जा रहा है। उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणियों के खिलाफ उपजा जन-आक्रोश भाजपा के पक्ष में वोटों के ध्रुवीकरण का बड़ा कारण बना। इसके अलावा, इंडिया गठबंधन (I.N.D.I.A.) की आपसी फूट—विशेषकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी के बीच तालमेल की कमी—ने भाजपा की राह को और आसान बना दिया। अब भाजपा का अगला लक्ष्य 2027 में पंजाब और हिमाचल प्रदेश में अपनी सत्ता स्थापित करना है।


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