होलिका दहन में क्यों भूनी जाती हैं गेहूं की बालियां, इन बीमारियों से मुक्ति
होलिका दहन कि आग बेहद पवित्र बताई गई है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी मानी जाती है. ज्योतिष शास्त्र में होलिका दहन पर कई उपाय ऐसे बताए गए हैं, जो शारीरिक बीमारियों को दूर करने के साथ सुख-समृद्धि में बेहद सहायक हैं. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन से दो-तीन दिन पूर्व तोड़कर घर पर सुखाई गई गेहूं की बालियां यदि होलिका दहन की आग में सेंकी जाए तो औषधि तैयार हो जाती है. गेहूं के इन भुने हुए दानों को प्रसाद रूप में लेने से कई रोगों से मुक्ति मिलने की धार्मिक मान्यता है. इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है.
सालभर इंतजार
लोकल 18 से बात करते हुए हरिद्वार के ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि होलिका दहन का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होता है. होलिका दहन पूर्णिमा की रात को किया जाता है, जिसका इंतजार हिंदू धर्म के लोग सालभर करते हैं. होलिका दहन पर गोबर के बड़कुल्ले, गन्ना, सूखे मेवे की माला और गेहूं की सूखी हुई बालियां आदि भूनकर खाने की परंपरा काफी पुरानी है. ऐसा करने से मौसम परिवर्तन में होने वाली सभी बीमारियां खत्म हो जाती हैं. गेहूं की बाल ही क्यों सेक कर खानी चाहिए, इसका जवाब देते हुए श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि वैसे तो सूखे मेवे, गन्ना भी सेंक कर खाने की परंपरा है, लेकिन गेहूं नया अनाज होता है और इस समय गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है. नया अनाज किसी को बीमार न करें इसलिए गेहूं की बाल को होलिका की आग में सेंक कर खाने की परंपरा है.
पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि गेहूं की बाली दो या तीन दिन पहले तोड़कर सुखाई जाती है. सूखने के बाद पूर्णिमा की रात होलिका दहन पर इन्हें भूनकर या सेंक कर खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता में बढ़ोतरी होती है. गेहूं की बाली को शक्कर में मिलाकर उसका प्रसाद अपने ईष्ट मित्रों, परिजनों और सगे संबंधियों को बांटा जाता है, जिससे सर्दी जुकाम, वायरल बुखार आदि सभी से बचाव होता है.


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