*प्रतिबंधित पॉलीथिन के कचरों के पहाड़ :-  उत्पादन स्तर पर नियामक और नियंत्रण तंत्र ही असली अपराधी* 

दीपावली के बाद देश के हर महानगर, शहर, क़स्बे और गाँव में कचरे के पहाड़ पालीथीन से पटे हुए नज़र आते हैं । यहाँ तक कि गली, हर बाज़ार में आज भी प्रतिबंधित पॉलीथिन थैलियाँ खुलकर बिकती दिखाई देती हैं। सवाल यह नहीं कि देश के आम लोग नियमों को जानते हैं या नहीं, सवाल यह है कि इन घातक वस्तुओं का उत्पादन ही आखिर रुक क्यों नहीं पा रहा है? जब उत्पादन पर नियंत्रण का तंत्र मौजूद होकर भी  प्रभावी न हो, तो बाज़ार और उपभोक्ता स्तर पर रोकथाम का दावा महज़ औपचारिकता से भरा दिखावा प्रतीत होता है।

दरअसल, इस पूरे तंत्र की जड़ में प्रशासनिक संलिप्तता और मौन स्वीकृति छिपी हुई महसूस होती हैं । प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 (संशोधित 2022 तक) के अनुसार, 120 माइक्रॉन से कम मोटाई वाली (पहले जो 50 था) किसी भी प्लास्टिक पन्नी का निर्माण, भंडारण या उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है। फिर भी क्या देश के अनेक हिस्सों में अनरजिस्टर्ड मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स बिना किसी वैध लाइसेंस के चल रही हैं , जो रोज़ाना टनों प्रतिबंधित पॉलीथिन बनाकर सप्लाई कर रही हैं या सभी रूप से वैधता प्राप्त मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में ही  इनका मिलीभगत के साथ उत्पादन हो रहा है ? 

पूरी इच्छाशक्ति के साथ अगर प्रोडक्शन पॉइंट पर ही यह उत्पाद-प्रवाह रोका जाए तो यह माल न बाजार में पहुँचेगा, न किसी दुकानदार या ग्राहक तक, वरना सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (SPCB) जैसी नियामक संस्थाओं की पंजीकरण प्रणाली केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी । ज़मीनी स्तर पर फील्ड इंस्पेक्शन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग का अभाव इस अपराध को खुला मैदान दे रहा है। यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या बिना पंजीकरण के ये इकाइयाँ चल रही हैं ? यदि हाँ तो बिजली कनेक्शन, कच्चा माल, और परिवहन अनुमति किसके संरक्षण में मिल रहे हैं ?  तो यह स्पष्ट रूप से माना जा सकता है कि यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत उदासीनता और संलिप्तता का परिणाम ही है।

*कानून के तहत सज़ा तो है*
एनवायरनमेंट (प्रोटेक्शन) एक्ट 1986 की धारा 15 में पाँच वर्ष तक का कारावास और एक लाख रुपये तक का जुर्माना तय है। परंतु दंड का बोझ प्रायः छोटे दुकानदारों या उपभोक्ताओं पर ही गिरता है। जबकि असली दोषी वह अधिकारी, वह उद्योगपति या वह विभाग जो इस पूरे प्रवाह को रोकने में असफल या अनिच्छुक है और इसके बावजूद कानूनी घेरे से बाहर बना रहता है। उन्हें चाहिए कि उनके दायित्वों के निर्वहन तथा अनुपालन में उत्पादक से ख़रीदी करने वाले थोक एवं चिल्लर ग्राहक , उपयोग करने वाले दुकानदार और ग्राहकों को सम्मान एवं पुरस्कार के साथ संगठित अपराधियों  के खिलाफ शसक्त शासकीय गवाह के रूप में तैयार किया जाये ।
*प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स (ईपीआर)*
        ‘ईपीआर’ मेकेनिज्म यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी की अवधारणा रखी गई थी , ताकि निर्माता, आयातक और ब्रांड मालिक अपने प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की ज़िम्मेदारी स्वयं निभाएँ। पर हकीकत यह है कि यह व्यवस्था केवल सेल्फ-डिक्लेरेशन पोर्टल बनकर रह गई है। फील्ड वेरिफिकेशन न के बराबर है, और कंप्लायंस ऑडिट अक्सर कागज़ों में सीमित। 
        आज देश को आवश्यकता है कि इन नियमों में एक नया प्रावधान  ‘प्रशासनिक जवाबदेही (Administrative Accountability Clause)’ को भी जोड़ा जाए। जब किसी क्षेत्र में प्रतिबंधित उत्पादन या बिक्री सिद्ध हो, तो संबंधित प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी, नगर निकाय अधिकारी या लाइसेंस जारी करने वाला अधिकारी भी समान रूप से दंडित हो। केवल दुकानदार या उपयोगकर्ता को पकड़ना केवल “ चंद पत्तीयों पर प्रहार” है , पर उसकी पालनहारा ‘विषाक्त जड़ों’  पर प्रहार तभी होगा जब उत्पादन और नियामक स्तर दोनों पर सख्ती लागू होगी।  
     *यदि हमारी सरकारें वास्तव में ज़ीरो टालरेंस का दावा कर उसको अमली जामा पहनाना चाहती हैं, तो पहले उन्हें यह तय करना होगा कि उनके अपने तंत्र के अधिकारी और संस्थान कितने जवाबदेह हैं। पर्यावरण की रक्षा सिर्फ़ जनता का ही नहीं बल्कि मानसिक तौर पर शासक बन चुकी कार्यपालिका का भी नैतिक कर्तव्य है। अब समय आ गया है कि “स्वच्छ भारत - जवाबदेह भारत” को मूल मंत्र बना दिया जाए जहाँ नियमों की अनिवार्यता केवल नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि नियम बनाने और लागू करने वाले नियामकीय और नियंत्रणकर्ताओं के लिए भी समान रूप से लागू हों।*

वीरेंद्र कुमार पालीवाल 
(देश का आम नागरिक)