सीबीएसई को सुप्रीम कोर्ट का आदेश, स्कूल भवन निर्माण में स्थानीय कानूनों का पालन अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि देश में नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों का संचालन ऐसे भवनों में होना चाहिए जिनका निर्माण स्थानीय कानूनों के अनुरूप हुआ हो। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई और आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश पारित किया।
कोर्ट ने स्कूल की सीढ़ियों लेकर भी निर्देश जारी किए
याचिका में सीबीएसई ने शीर्ष अदालत के 13 अप्रैल 2009 के फैसले में दिए गए निर्देशों को लेकर जानकारी मांगी है। अपने 2009 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्देश दिया था। इसके मुताबिक नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों को एक मंजिला इमारत वाले भवन में संचालित किया जाए। साथ ही भवन में भूतल समेत तीन से ज्यादा मंजिल नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने स्कूल की सीढ़ियों लेकर भी निर्देश जारी किए थे।
सीबीएसई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कोर्ट ने 2009 में आग के खतरों के मद्देनजर यह निर्देश जारी किए थे। अब देश में कई राज्य ऐसे हैं जिनके भवन निर्माण नियमों में आग से बचाव के इंतजामों के साथ चार मंजिला और पांच मंजिला इमारतें तक बनाने की अनुमति है।
सीबीएसई के मानदंड सुप्रीम कोर्ट के 2009 के फैसले के अनुरूप हैं। सुप्रीम कोर्ट के 2009 के फैसले के बाद राष्ट्रीय भवन संहिता 2016 आई। कई राज्यों के अपने नियमों में बदलाव कर लिया। अब दिक्कत तब आती है जब सीबीएसई के पास मान्यता के लिए आवेदन आता है तो हम सुप्रीम कोर्ट के 2009 के निर्देशों के अनुसार काम करते हैं।
बांबे हाई कोर्ट के आदेश में महिला विरोधी शब्द के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट को आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बांबे हाई कोर्ट के उस आदेश पर आपत्ति जताई, जिसमें एक महिला के लिए अवैध पत्नी और वफादार रखैल जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि
यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और महिला विरोधी टिप्पणी है।
ऐसे शब्दों का प्रयोग संविधान के मूल्यों और आदर्शों के खिलाफ
जस्टिस, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ ने बांबे हाई कोर्ट द्वारा इस्तेमाल की गई आपत्तिजनक भाषा पर संज्ञान लेते हुए कहा कि ऐसे शब्दों का प्रयोग संविधान के मूल्यों और आदर्शों के खिलाफ हैं।


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